Worship

उपासना को साधारण शब्दों में व्यक्ति के द्वारा अपनी आध्यात्मिक संतुष्टि हेतु किया गया चिंतन व मनन कह सकते है। हालांकि यदि हम जाम्भोजी के काल में प्रचलित उपासना विधि को देखें तो यह केवल एक प्रक्रिया मात्र नजर आती है जिसका उद्देश्य कोई आध्यात्मिक संतुष्टि न होकर केवल भौतिक साधनों की प्राप्ति नजर आती है। जाम्भोजी ने उपासना से पहले आत्मा व परमात्मा के संम्बंध को मनुष्य के समक्ष रखा व इस पूरे जगत को ब्रह्ममय बताया व मनुष्य को परमात्मा का ही अंश बताया । भवणि भवणि म्हारे एका जोति , पवणा रूप रमै परमेसर , बाहर भितरी सरब निरंतरि जहां चिन्हो तहां सोई , इत्यादि अनेक शब्दों में यह स्पष्ट है कि यह सारा जगत ब्रह्ममय है । वही जाम्भोजी ने जीवआत्मा को विभिन्न पर्याय शब्दों से जैसे गुरू परतकि, जीव, जीवड़ो, देही, देहड़ी , रूही, चेतन रावल, रतनकाया, निरमळी काया, राय अथरगढ़ पुकारा व निरंतर जीवआत्मा की शुद्धिकरण पर बल दिया साथ ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा को भीतर की ओर गमन करने पर बल दिया । जाम्भोजी ने शबदवाणी में बार बार आत्मतत्व के ज्ञान व खोज का उपदेश दिया है । जागो जोवो जोति न खोवो, छलि जासी संसारू अर्थात हे लोगो जागो, आत्मतत्व को खोजो, जीवन ऐसे ही मत बिताओ, किसी भी दिन यह आत्मा शरीर छोड़कर संसार से चली जाएगी । अर्थात जाम्भोजी ने उपासना का विषय सम्पूर्ण जगत परमात्मा व जीव| आत्मा को माना है ।
परमात्मा की उपासना : जाम्भोजी ने परमात्मा को विष्णु नाम से पुकारा है और उसे निर्गुण निराकार रूप में जगत में व्याप्त माना है और परमात्मा की उपासना का सीधा व सरल उपाय नाम जप विधि बताया है हिरदे नांम विसन को जपो, हाथे करो टवाई अर्थात ह्रद्य में विष्णु का नाम जपो व हाथ से अपने काम करते रहो । विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी ।
जाम्भोजी ने माना कि परमात्मा का वर्णन वाणी के परे है और उसका वर्णन करने में बार बार निराश ही होना पड़ता है
आछै उरवार न ताथै पारू, ओवड़ छेवड़ कोइय न थीयो, तिहका अन्त लहीबा कैसा
वळि वळि भणंत वियासूं नना अगम न आसूं
नना उदक उदासूं, वळि वळि भई निरासूं
जाम्भोजी ने शबदवाणी में अनेक जगह पर निर्गुण विष्णु का उल्लेख किया है व वही सगुण रूप में अवतार लेता है ।
तद म्हे रह्या निरालमभ होय करि उतपति धंधूकारी।
निर्गुण रूप अम्हे पतियाणी थळ सिर रह्यो अगोचर वाणी।
जूग अनंत अनंता वरत्या म्हे सून्य मंडल का राजूं।
जाम्भोजी ने शबदवाणी में शब्द संख्या ४ में परमात्मा की उपासना के विषय में निर्णायक मत दिया है कि
१ परमात्मा का स्वरूप वाणी से नही बताया जा सकता
२ हम किसी जाये हुए जीव अर्थात पैदा हुए जीव का जप नही करते
३ हम तो केवल माता पिता रहित सृष्टि की उत्पति व विऩाश के कारक, मूल रहित अनादि , निरालम्ब ,स्वयम्भु का जप करते है जो जाया जीव नही है
४ पूर्व में जो नौ अवतार हुए वह हमारे ही रूप थे
इस प्रकार जाम्भोजी परमात्मा की उपासना की श्रेष्ठ विधि नाम जप विधि को ही मानते है इसीलिए शबदवाणी का मूल भाव ही विष्णु नाम के जप करने पर जोर देना है ।
जाम्भोजी ने परमात्मा की उपासना में प्रतीक उपासना की खंडन किया है परन्तु साथ ही जगत को ब्रह्ममय मानकर पवन,सूर्य व चन्द्रमा जैसे प्रतीकों को श्रद्धा का विषय माना है परन्तु यह इसीलिए कि ये प्रतीक भी परमात्मा के ही स्वरूप है व इनके प्रति व्यक्त श्रद्धा से मानव परमात्मा की ओर उन्मुख हो पायेगा।

आत्मा की उपासना: आत्मा की उपासना के लिए जाम्भोजी ने अच्छे कर्म यानि सुकरत पर बल दिया है और साथ ही मन पर नियंत्रण कर बुद्धि व मन के विकारों को दूर करने पर जोर दिया है । जाम्भोजी ने सुकरत पर बल दिया है सुकरत साथ सखाई चालै अर्थात सुकृत्य ही जीवात्मा के साक्षी रूप में साथ जायेंगे । घड़ी घटंतर , पहर पटंतर रात दिनंतर, मास पखंतर , खिण ओल्हरिबा काळूं । शरीर के स्वस्थ और समय रहते मुक्ति के साधन आत्मतत्व को जानने का प्रयास करना चाहिए । सुकृत्य और परोपकार करने का कोई समय नही होता ,ऐसा करते हुए बाधाएं आऐं तो पछतावा नही करना चाहिए : सुकरत करता हरकत आवै , तो ना पछतावो करियो । यदि जीनव में सुकृत्य नही किये तो जीवआत्मा को बार बार ऐसे कर्मों के फलस्वरूप भिन्न भिन्न जन्म मिलते रहेंगें व जीवआत्मा भटकती रहेगी गावें गाडर सहरे सूअर , जळम जळम अवतारूं ।
जाम्भोजी ने शबदवाणी में अनेक जगह पर मन व मन की एकाग्रता को वश में करने पर बल दिया है जैसे सतगुरू तोड़े मन का साला, रे मुल्ला मन माहीं मसीत निवाज गुजारिये, दोय मन दोय दिल सीवी न कथा, तन मन धोईये संजम होईये हरष न खोईये, मूंड मुंडावौ मन न मुंडावौ, मन न डोले ध्यान न टळे कायापति नगरी मन पति राजा वस को आछै महिमंडलि सुरा मन राय सूं जूझ रचायले ।।।
एक मन एक चित साबण लावै।।।
मन मुखी भार उठावै ।
सार रूप में यदि मन स्थिर नही है तो मन पांच इन्द्रियों का अनुगामी हो जायेगा और विषयों में रत होकर मन भौतिक संसार से चिपके रहेगा।
मन को वश में करने के लिए जाम्भोजी ने शबदवाणी में कहा कि मेरेपन का त्याग और हठ का त्याग , दुनिया की देखादेखी नही करना , निरंतर मात्र स्वयं के बारे में सोचना बन्द करना, जीवआत्मा का निरंतर ध्यान करना, संकीर्ण विचारों व दुविधा वृति का त्याग व सत्कर्मों का संकल्प करना, विष्णु का नाम स्मरण करना व लोक कल्याण की भावना रखना जैसे कार्यों से मन को वश में किया जा सकता है ।
मन के बाद जाम्भोजी ने बुद्धि की मलिनता को दूर करने पर बल दिया है क्योंकि बुद्धि को जाम्भोजी ने सब इन्द्रियों में श्रेष्ठ माना है जिसकी आज्ञानुसार ही यह शरीर कार्य करता है और यदि बुद्धि मलिन हो तो कर्म भी मलिन होंगें व ऐसे कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य को बार बार जन्म लेना पड़ता है व मुक्ति नही मिल पाती । जाम्भोजी ने मन पर नियंत्रण के लिए भी बुद्धि को ही जिम्मेदार माना है व सत्कर्मों से बुद्धि की शुचिता पर बल दिया है ।
जादिन तेरे होम न जाप न तप न क्रिया जाण के भागी कपिला गायो । अर्थात जिस दिन तुने होम जप तप नही किया उस दिन तू ऐसा समझ कि कपिला गायरूपी शुद्ध बुद्धि तेरे घर से भाग गई ।
बुद्धि के बाद जाम्भोजी ने आत्मा की उपासना के लिए सबसे ज्यादा जोर अहंकार के त्याग पर दिया है क्योंकि अहंकार के त्याग से ही व्यक्ति को शरीर से अपनी पृथकता का बोध होता है व व्यक्ति अपनी आत्मा को विष्णु रूप में जान पाता है ।
अरथ न गरथ न गरब न हूंता
जा जा घमंड स मंडयौ ताके ताव न छायौ ।
जां जां वादविवादी अति अहंकारी लबधि सवादि ।
जे नर दावो छोड़यो मेर चुकाई ।
अर्थात जाम्भोजी ने आत्मा की उपासना के लिए इन वृत्तियों को वश में कर चिंतन करने पर बल दिया है ।

सार रूप में आत्मा की उपासना ही परमात्मा की उपासना है और जाम्भोजी का यह उद्देश्य रहा कि उपासना के विषय पर मानव आत्मा में ही विष्णु रूप के दर्शन करे व सुकृत्य करे जिससे अंततः आत्मा के शुद्धिकरण से सम्पूर्ण जगत में मानव व प्रकृति के कल्याण की भावना विकसित हो ।
जाम्भोजी ने उपासना को कर्म का ही विषय बनाया है जिससे मनुष्य कर्मवादी बन सके व प्रतीकों के भरोसे रहकर जीवन नष्ट न करें।

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