The holy Khanda of Lord guruJambheshwar, which was presented to Doodoji

जम्भैशवर भगवान का पवित्र खाण्डा, जो दूदोजी को भेण्ट किया :-
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~भगवान जम्भेश्वर ने बाल्यावस्था से ही अद्भुत चमत्कार करने शुरू कर दिये थे। मेड़ता के राव दूदो का राज्य भाईयों द्वारा छिन कर दूदो को देश निकाला दे दिया था। दूदो अपने भाई के पास बीकानेर जा रहा था। पीपासर की रोही में भगवान बालक के रूप में गायें चरा रहे थे। दूदो ने पीपासर के कुएं के पास तम्बू लगाकर रात्रि विश्राम किया था। सुबह बालक जम्भेश्वर के अलौकिक लक्षण देखकर दूदो ने अपना दुखड़ा बालक जम्भेश्वर के सामने सुनाया। बालक जम्भेश्वर ने एक केर की लकड़ी दूदो को भेण्ट कर कहा- जाओ वत्स तुम्हारा राज्य तुम्हे वापस मिल जायेगा। दूदो के मन में शंका हुई इतने में भगवान जम्भेश्वर समझ गये। उनके चमत्कार से केर की लकड़ी सप्तधातु की तलवार बन गई। जिसकी मूंठ लकड़ी की रह गई। तलवार बनते ही दूदो की दृढ़ आस्था बन गई। आत्मविश्वास हो गया बालक जम्भेश्वर ने खाण्डा देने के साथ ही कहा कि मेड़ता पंहुचने से पहले मूण्डवा गांव के पास लाखोलाव तालाब पर जहां इच्छा करे वहां तम्बू लगवा लेना। तम्बू के अंदर जमीन खोद लेना। वहां धन दौलत से भरे चरू मिलेंगे। उस धन से उपकार करना और राज करना। दूदो ने भगवान की आज्ञा की पालना की और धन के चरू प्राप्त कर मेड़ता पंहुच गये। दूदो के पंहुचने से ही पहले ही भगवान जम्भेश्वर ने मेड़ता में प्रकट होकर दूदो को राज देने की तैयारी करवा दी थी। दूदो के मेड़ता पंहुचने पर आदर सम्मान के साथ राज्य मिल गया।
दोहा :
थलिये ओट दूदो मिल्यो तूठा सारा काज।।
जब लग खाण्डो पूजसी, तब लग निश्चल राज।।

राव दूदो ने आजीवन राज किया। खाण्डे की पूजा की भगवान जम्भेश्वर के शिष्य बनकर धर्म की पालना की। धन दौलत से परोपकार व धर्म किया। भावी पीढ़ी को भी भगवान जम्भेश्वर द्वारा प्रदत खाण्डे की पूजा करने की परम्परा कायम रखवाई। राव दूदोजी की तीसरी पीढ़ी में 17वीं शताब्दी में उनका ही वशंज राव जगन्नाथ हुए। जगन्नाथ ने धर्म की पालना में ढ़ील बरतनी शुरु कर दी थी। अभिमानी और नास्तिक जीवन जीने लगा। एक दिन राव जगन्नाथ अपने कुटुम्बियों के साथ नागौर के गुलर गांव में किसी बारात में गये हुए थे। प्रसंग चलते ही किसी राजपूत बाराती ने कटु वचन कहे तथा ताना मारा कि मेड़तियों का राज भगवान जम्भेश्वर द्वारा दिये गये खाण्डे के बल पर चल रहा है। उसके ताने से क्रोधित होकर जगन्नाथ ने कह डाला कि हम भुजाओं के बल पर राज कर रहे हैं। उस दिन वह खाण्डा जगन्नाथ के पास था। बारात में उपस्थित अन्य कई लोग इस जिद पर उतर आये कि अगर भगवान जम्भेश्वर द्वारा बताये गये मार्ग पर नहीं चलते हैं और उनके द्वारा प्रदत्त खाण्डा व वरदान के आधार पर राज नहीं चलाते हैं तो इस खाण्डे से बकरे का वध करके दिखाओ। राजमद व अज्ञानता के वशीभूत राव जगन्नाथ ने विवाद करके एक बकरे के गर्दन पर चालने के लिए खाण्डा म्यान में से निकाला। वध के लिए वार किया तो फिर चमत्कार हो गया। उस खाण्डे की मूंठ जगन्नाथ के हाथ में रह गई और खाण्डा आकाश में उड़ गया। जगन्नाथ हक्का बक्का रह गया। वहां उपस्थित लोगों ने भगवान जम्भेश्वर के चमत्कार को देखकर मन ही मन नमन किया। मूंठ भी राव ने नीचे पटक दी वह मूंठ गुलर में एक ठाकुर के घर पर है वे आज भी उसकी पूजा करते हैं। वही उपस्थित एक कवि ने कहा :-

दोहा- तखतूली सी आंगलिया, डंकोली सा हाथ।
भलो गमायो मेड़तो दुर्बलिया जगन्नाथ।

इस प्रकार राव दूदो का वह पूजनीय खाण्डा डेगाना के समीप आसोजा की डूंगरी (पहाड़ी) पर जा गिरा। भगवान जम्भेश्वर का फिर चमत्कार हुआ। 17वीं शताब्दी में केसोजी गोदारा बिश्नोई समाज के विद्वान सन्त तथा कवि व साहित्यकार थे। उन दिनों केसोजी रोटू साथरी पर ठहरे हुए थे। दिन में सत्संग करते थे। रात में जब सन्त केसोजी सो रहे थे तो स्वपन में भगवान जम्भेश्वर के दर्शन हुए। दर्शन देकर भगवान ने केसोजी को राव जगन्नाथ की बात बताते हुए कहा कि तुम आसोजा की डूंगरी पर जाकर वह खाण्डा ले आओ और रोटू गांव के मंदिर में रख दो। रोटू के भादू भविष्य में इस खाण्डे की पूजा करते रहेंगे। दूसरे दिन प्रात: सन्त केसोजी ने स्वपन की घटना रोटू गांव के लोगों को सुनाई और आसोजा की डूंगरी पर गये। वहां डूंगरी के ऊपर बिना मूंठ का वह चमत्कारी खाण्डा (सप्तधातु की तलवार) मिल गया। संत केसोजी ने वह खाण्डा ससम्मान लाकर भगवान जम्भेश्वर के चरण चिन्ह पर बने मंदिर में सुरक्षित रख दिया। उसके दूसरी मूंठ भी लगाई उस समय से आज तक रोटू के भादू बिश्नोई सुबह शाम दोनों समय खाण्डे की विधिवत पूजा करते है।
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जम्भैशवर भगवान की जय

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