Do not worship god of stone

[पत्थर के देव न पूजेँ ]
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जाम्भाणी रुप :- नारायण के अनन्त नाम और अवतार है । लोक-लज्जा त्याग कर दृढ विशवास , निष्ठा और प्रेम से उसका नाम स्मरण करना चाहिए ।
‘ अलख , अजोनी , स्वयंभू नारायण ‘ ने अनेक अवतार रुपोँ मेँ बहुविध अनेक कार्य पूरे किए हैँ , किन्तु प्रत्येक अवतार –
” अंनस कला ” का ही था , 
अनन्त कला – युक्त पूर्णब्रह्म तो जाम्भोजी के रुप मेँ ही अब आए है । अन्य अवतारोँ और जाम्भोजी मेँ यही अन्तर है । उनके आने का कारण है प्रह्लाद से वचनबद्ध होना ।
बहुत ही सन्ताप के साथ-
” ऊदोजी ” का कथन है कि वे लोग सचमुच अभागे हैँ जो पूरण ब्रह्म जाम्भोजी जैसे प्रत्यक्ष देव को नहीँ पहचानते , जानते या मानते और पत्थर के देव की पूजा करते है ।
यदि जीव-उद्धार के लिए जाम्भोजी नहीँ आते , और –
” पंथ ” नहीँ चलाते , तो पृथ्वी पाप से डूब जाती ।
ऊदोजी- प्रत्यक्ष विष्णु-जाम्भोजी से प्रार्थना है कि जो नर मुक्ति मांगे , उसे वे मुक्ति अवश्य देँ , तथा पात्र के अनुसार
” पूजती मजूरी ” दे ।
इस संदर्भ मेँ कवि का कथन है कि आवागमन से छुटकारा ह्रदय मेँ प्रेमा-भक्ति उत्पन्न होने के फलस्वरुप कर्म-बन्धन कटने पर भी मिल सकती है ।
दसावतार वर्णन जाम्भाणी कवियोँ का प्रिय विषय रहा है ।
ऊदोजी नैण भी अवतार रुपोँ को नमस्कार करना नहीँ भूले है । कल्कि अवतार के साथ ही वे कलियुग का अन्त देखना चाहते है ॥
Note…
ये लेख ” जाम्भोजी , विशनोई सम्प्रदाय और साहित्य ” ग्रंथ से लिया गया है ।

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